Meri Pehli Rail Yatra Essay In Hindi

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Short Essay on 'A Rail Journey' | 'Train Journey' in Hindi | 'Rail Yatra' par Nibandh (150 Words)

Short Essay on 'A Rail Journey' | 'Train Journey' in Hindi | 'Rail Yatra' par Nibandh (150 Words)
रेल-यात्रा

रेल-यात्रा सदैव एक अविस्मर्णीय अनुभव होता है। मैंने रेल से अनेक बार यात्रा क़ी किन्तु इस बार क़ी रेल-यात्रा मुझे सदैव याद रहेगी।

पिछले सोमवार को मैं लखनऊ से दिल्ली क़ी रेल-यात्रा कर रही थी। मेरे डिब्बे में एक सज्जन खिड़की में पैर फैलाए अख़बार पढ़ रहे थे। वे बहुत सुन्दर चमकीले जूते पहने हुए थे। कभी-कभी वे महाशय इन जूतों को एड़ी में से बाहर कर लेते थे। इस प्रकार बिना ध्यान दिए एक जूता पैर से निकल कर गिर पड़ा। इस पर वह तत्काल उठे उन्होंने दूसरा जूता भी बाहर फ़ेंक दिया। एक साथ वाले सज्जन ने पूछा कि आपने दूसरा जूता क्यों फेंका? यात्री ने उत्तर दिया कि मैं एक जूते का क्या करता। अब दोनों तो किसी के काम आ सकेंगे।

यह सुनकर मुझे आश्चर्य तो हुआ परन्तु साथ ही उनकी सूझ कि प्रशंसा करनी पड़ी। प्रत्येक रेल यात्रा में कुछ न कुछ सीखने को अवश्य मिलता है।

मेरी प्रथम रेल यात्रा

Meri Pratham Rail Yatra

निबंध नंबर : 01

                किसी भी यात्रा का एक अपना अलग ही सुख है। यात्रा करना तो बहुत से लोगों की एक पसंद है। यात्रा के अनेक उपलब्ध साधनों में से रलयात्रा का अनुभव एक अनोखा रोमांच एंव अनुभव प्रदान करता है। मेरी प्रथम रेल यात्रा तो आज भी मेरे लिए अविस्मरणीय है क्योंकि मेरी प्रथम रेलयात्रा ने रोमांच के साथ ही मुझे एक ऐसा मित्र भी दिया जो आज मुझे सबसे अधिक प्रिय है। अतः इस दिन को तो मैं कभी भुला ही नहीं सकता।

                बात उस समय की है जब मैं आठ वर्ष का था। मेरे पिताजी को उनकी कंपनी की ओर से उनके अच्छे कार्य हेतू सपरिवार इस दिन के लिए रेल द्वारा देश भ्रमण का प्रबंध था। सभी रिजर्वेशन टिकट तथा अन्य मुझ तक पहुँची मेरी प्रसन्न्ता की सीमा न रही। इससे पूर्व मैंने रेलयात्रा के बारे में केवल सुना ही था। आज प्रथम बार इस अनुभव हेतू मैं बहुत ही रोमांचित, पुलकित एंव उत्साहित था।

                                रात्रि 10ः30 बजे हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँच गए। स्टेशन की इमारत और दौड़ते-भागते तरह-तरह के लोगों को देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। बहुत से कुली एक साथ हमारा सामान उठाने के लिए हमारी ओर लपके। पिता जी ने उनमें से एक की ओर संकेत किया और फिर हम उसके पीछे निश्चित प्लेटफार्म पर पहुँचे। वहाँ पर गाड़ी पहले से ही खड़ी थी। हमने अपनी पहले से ही रिजर्व सीटें ग्रहण कीं और सामान को नीचे रखकर आराम से बैठ गए। मैं खिड़की से कभी चाय-चाय चिल्लाते आदमी की तरफ देखता तो कभी सातने नल में पानी भरते हुए लोगों की भीड़ को। पिताजी ने पुस्तक विक्रेता से कुछ पत्रिकाएँ खरीद ली थीं। मैं अभी प्लेटफार्म की भीड़ में खोया था कि गार्ड की सीटी सुनाई दीं और गाड़ी चल पड़ी। वह अवसर मेरे लिए बहुत ही रोमांचदायक था।

                मेरी बर्थ के सामने ही मेरी उम्र का एक और लड़का था। वह भी मेरी तरह पहली बार रेलयात्रा कर रहा था। धीरे-धीरे हममें मित्रता हो गई। उसका नाम विशाल था। हमने रात को साथ-साथ भोजन लिया और कुछ देर बातें की। फिर हमने अपनी-अपनी सीटों पर एक सूती चादर बिछाया और लेट गए। पिता जी ने पहले से ही दो तकिए खरीद रखे थे जिनमें मुँह से हवा भर की मैंने फुलाया। फिर मैंने जब अपनी आँखें बंद कर लीं तो रेलगाड़ी के चलने की लयात्मक ध्वनि को सुनकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था। कुछ देर पश्चात् हमें नींद आ गई।

                सुबह जब मेरी आँख खुली तो उस समय का दृश्य अत्यंत सुखदायी था। ट्रेन तेज गति से छुक-छुक करती हुई भागती चली जा रही थी। रास्ते में हरे-भरे खेत, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी दिखाई दे रहे थे। ट्रेन में ही गरम नाश्ता और काॅफी मिल गई। बाहरी जीवंत दृश्य बहुत ही मोहक था। नाश्ते के पश्चात् विशाल ने अपनी कविताओं से सभी को मोहित कर लिया। इस बीच हमारी रेलगाड़ी एक बड़े स्टेशन पर रूकी। मैंने पिताजी से नीचे प्लेटफार्म पर उतरने की अनुमति माँगी। उन्होने अनुमति दे दी तो मैं वहाँ से अपनी बोतल में पानी भर लाया। हमारी गाड़ी फिर चल पड़ी। मैं खिड़की के निकट बैठकर बाहरी दृश्य का आनंद लेने लगा। कुछ समय पश्चात् हम गंतव्य तक पहुँच गए। हमने अपना सामान उठाया और ट्रेन से उतर गए। वास्तविक रूप में मैं आज भी उस प्रथम सुहावनी रेलयात्रा को भुला नहीं पाया हूँ। यह उसकी सुखद याद ही है जिसके कारण मुझे बार-बार रेलयात्रा करने का मन करता है। मैं पुनः छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार करता हूँ ताकि मुझे रेलयात्रा का अवसर मिल सके।    

 

निबंध नंबर : 02

 

मेरी पहली रेलयात्रा

Meri Pehli Rail Yatra

प्रस्तावना- रेल में यात्रा करना बहुत अच्छा लगता है। मैंने इस वाक्य को केवल अपने मित्रों एवं परिजनों से सुना था परन्तुु मुझे रेल में वैठने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था। मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं भी एक बार रेल में बैठूं।

मेरा उत्साह- मेरी बुआजी मुरादाबाद में रहती हैं। उनके लड़के का विवाह 21 जनवरी, 2005 को तय हुआ। मैने अपने परिजनों से रेल से मुरादाबाद जाने की इच्छा प्रकट की । उन्हांेने मेरी बात ली और इस प्रकार मुझे रेल से मुरादाबाद जाने का अवसर प्राप्त हुआ।

विवाह की सूचना चार दिन पूर्व ही मिलने के कारण हमारी सीटें आरक्षित न हो सकीं। अतः हमें स्टेशन पर गाडी़ छूटने से लगभग दो घण्टे पहले जाना पडा़ । जब हम प्लेटफार्म पर पहुंचे तो वहां यात्रियों की काफी भीड़ देखकर हम अचम्भित हो गये। शोरगुल से हमारे कान फटे जा रहे थे।

प्रतीक्षा की आकुलता- बहुत देर तक इन्तजार करने के बाद हमारी गाडी़ स्टेशन पर आ ही गयी। गाडी़ को देखते ही लोग पागल-से हो गये। वे एक -दूसरे को धक्का देकर चढ़ने लगे। इतनी धक्का-मुक्की के बाद हम जैसे-तैसे डिब्बे में दाखिल हो गये। पास बैठने की बिल्कुल भी जगह नहीं थी, परन्तु एक दयालु सज्जन ने मुझे अपने पास बैठा लिया।

मेरा अनुभव- हमारी गाडी़ मैदानी, इलाकों और नदी-नालों के पुलों से गुजरती आगे बढ़ती जा रही थी। जब भी मैं खिड़की में झांकता तो मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे हमारी गाडी़ तो रूकी हुई है और धरती, पेड़, पौधे आदि तीव्र गति से भाग रहे हैं।

जब प्लेटफार्म पर गाडी़ रूकती थी तो कभी सेब वाला, चने वाला, चाय वाला आदि रेल के अन्दर आकर अपना-अपना समान बेचते। रेल की इस यात्रा में मेरे अनेक मित्र बन गए।

यात्रा करते समय मुझे कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं बोर हो रहा हूं। सारा समय पूरी हॅंसी-मजाक एवं खुशी से व्यतीत हुआ।

उपसंहार- हमारी रेल मुरादाबाद क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी थी तथा समय पर ही, मुरादाबाद स्टेशन पर पहंुच गयी। ट्रेन के रूकते ही हम बाहर आ गई और एक कुली को बुलाकर अपना सारा समान उत्तरवा लिया। फिर हम टैक्सी में बैठकर अपनी बुआ जी के घर पहुंच गए।

January 1, 2018evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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